Monday, June 22, 2026
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माता-पिता की गुहार पर बेटे को इच्छामृत्यु, 13 साल से कोमा में बेटा, सुप्रीम कोर्ट ने दी इजाजत

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून बनाने को कहा

by Dakshi Sahu Rao
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CG Prime News@दिल्ली. The Supreme Court allowed euthanasia for the first time सुप्रीम कोर्ट ने एक लाचार माता-पिता की गुहार पर उनके 31 साल के बेटे की इच्छामृत्यु को मंजूरी दे दी है। भारत में इच्छामृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला है। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला हरीश की मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा की इच्छामृत्यु देने की अपील पर सुनाया।

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माता-पिता की गुहार पर बेटे को इच्छामृत्यु, 13 साल से कोमा में बेटा, सुप्रीम कोर्ट ने दी इजाजत

मरीज की गरिमा बनी रहे

देश में इस तरह का यह पहला मामला है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने एम्स (एम्स) को निर्देश दिया कि 13 साल से कोमा में रह रहे हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए। यह प्रोसेस इस तरह से की जानी चाहिए कि मरीज की गरिमा बनी रहे।

हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरे थे

दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। वह न कुछ बोल सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं। डॉक्टर्स ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती।

13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है। यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून बनाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर कानून बनाने पर विचार करने का भी कहा। फिलहाल भारत में यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के आधार पर ही संभव है, जिसमें मरीज की स्थिति पर दो मेडिकल बोर्ड की राय जरूरी होती है।

प्राकृतिक रूप से मौत हो सके

पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मौत हो सके।

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