30 दिनों के भीतर राज्य शासन के समक्ष अपील का प्रावधान
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग जिले के एक चिकित्सक के खिलाफ पारित जिलाबदर (एक्सटर्नमेंट) आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 22 जनवरी 2026 को पारित आदेश में डब्ल्यूपीसीआर क्रमांक 43/2026 का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को वैकल्पिक वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है। (High Court strict on the order of deportation, refuses to interfere)
क्या है मामला
दुर्ग कलेक्टर अभिजित सिंह ने प्रकरण क्रमांक 13/2025 में 8 जनवरी 2026 को आदेश पारित करते हुए अहिवारा निवासी डॉ. दुश्यंत खोसला (48 ) को जिलाबदर का आदेश दिया। उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 की धारा 5(ख) के तहत जिले एवं आसपास के जिलों से एक वर्ष की अवधि के लिए निष्कासित कर दिया था।
आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में दायर की याचिका
डॉ. दुश्यंत खोसला ने उक्त आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में जिलाबदर आदेश निरस्त करने और अंतिम निर्णय तक दुर्ग जिले में निवास कर चिकित्सा प्रैक्टिस जारी रखने की अनुमति देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत सिंह और राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता प्रियांक राठी ने पक्ष रखा।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 की धारा 9 के तहत ऐसे आदेश के विरुद्ध 30 दिनों के भीतर राज्य शासन के समक्ष अपील का प्रावधान है। साथ ही यह भी कहा गया कि अपील लंबित रहने के दौरान जिलाबदर आदेश प्रभावी रहेगा, जब तक कि राज्य सरकार अन्यथा निर्देश न दे। न्यायालय ने माना कि जब कानून में प्रभावी वैकल्पिक अपील का उपाय उपलब्ध है, तब प्रत्यक्ष हस्तक्षेप उचित नहीं है। इसी आधार पर याचिका का निस्तारण करते हुए अपील दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।
