CG Prime News@दिल्ली. Allahabad High Court Justice Yashwant Verma, embroiled in the ‘Note-Scandal’, has resigned नोटकांड के बाद चर्चा में आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा भेज दिया है। 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी घर में आग लगने के दौरान 500-500 के नोटों के बंडल जले मिले थे। इसके बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था।
गहरे दु:ख के साथ इस्तीफा दे रहा हूं
जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफे में लिखा है- मैं आपके सम्मानित कार्यालय को उन कारणों से परेशान नहीं करना चाहता, जिनकी वजह से मुझे यह पत्र लिखना पड़ रहा है। लेकिन गहरे दु:ख के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे रहा हूं। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।
नहीं दी गई थी कोई जिम्मेदारी
जस्टिस वर्मा ने नोटकांड के बाद 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी, लेकिन उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। मामले की जांच पूरी होने तक उन्हें न्यायिक कामों से दूर रखा गया था। जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को इस्तीफा भेजा था, लेकिन न्यूज एजेंसी ने अगले दिन, यानी 10 अप्रैल को इसकी जानकारी दी।
जस्टिस वर्मा ने महाभियोग प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी
लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। उन्होंने इसे चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसमें कहा था कि दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन राज्यसभा ने उसे मंजूर नहीं किया। इसके बावजूद लोकसभा ने जांच समिति बना दी, जो गलत है।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने दोषी माना
सुप्रीम कोर्ट के चीफ संजीव खन्ना ने 22 मार्च को जस्टिस वर्मा पर लगे आरोपों की इंटरनल जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई थी। इसने 4 मई को CJI को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें जस्टिस वर्मा को दोषी ठहराया गया था।
लोकसभा स्पीकर के पास जांच का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोकसभा स्पीकर की ओर से गठित संसदीय जांच पैनल में कुछ खामी दिखाई देती है। लेकिन जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत लोकसभा स्पीकर के पास यह अधिकार है कि वह जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित कर सकें, भले ही राज्यसभा में ऐसा प्रस्ताव खारिज हो चुका हो। सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को फैसला सुरक्षित रखा था। लेकिन कोर्ट ने जस्टिस वर्मा को पार्लियामेंट्री कमेटी के सामने जवाब दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने से मना कर दिया था।
