बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली | पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। तेल-गैस ठिकानों पर हमलों के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इसके साथ ही रुपये की कमजोरी ने भारत की आयात लागत को और बढ़ा दिया है।
प्रीमियम ईंधन और इंडस्ट्रियल डीजल महंगा
भारत में प्रीमियम पेट्रोल की हिस्सेदारी भले ही 2-4% है, लेकिन इसकी कीमत में करीब 2.35 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं इंडस्ट्रियल डीजल के दाम में करीब 21 रुपये की तेज बढ़ोतरी हुई है। यह डीजल भारी उद्योगों और मशीनरी में इस्तेमाल होता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ने और महंगाई के बढ़ने की आशंका है।
रिफाइनरी पर हमलों से सप्लाई संकट
मौजूदा संघर्ष में तेल ठिकानों को निशाना बनाए जाने से सप्लाई चेन पर असर पड़ा है। ईरान द्वारा कुवैत की मीना अल अहमदी रिफाइनरी पर हमले की खबरों के बाद उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे बड़े उत्पादक देशों की क्षमता भी प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है।
रुपये की कमजोरी से बढ़ा दबाव
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरकर 93.71 तक पहुंच गया है। इससे भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। ऊर्जा आयात पर बढ़ती लागत का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
महंगाई का खतरा गहराया
हालांकि सरकार ने फिलहाल सामान्य पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की है, लेकिन प्रीमियम ईंधन और इंडस्ट्रियल डीजल महंगा होने से इसका असर बाजार पर पड़ना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी, कंपनियों का मुनाफा घटेगा और रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
वैश्विक समाधान की कोशिशें
ऊर्जा संकट को देखते हुए जापान, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी समेत कई देश होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित बनाने के प्रयास में जुटे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी समाधान अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच तनाव कम होने पर ही संभव है।
