गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही | लेमनग्रास की खेती अब छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत साधन बनकर उभर रही है। कम लागत, अधिक मुनाफा और बंजर भूमि पर भी सफल उत्पादन के कारण यह फसल किसानों की किस्मत बदल रही है। खास बात यह है कि लेमनग्रास की खेती जंगली जानवरों और कीटों से लगभग सुरक्षित रहती है तथा एक बार रोपण के बाद कई वर्षों तक लगातार पैदावार देती है।
आदिवासी अंचल में आय का नया मॉडल
छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के माध्यम से गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही जिले में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। वन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देश और बोर्ड अध्यक्ष विकास मरकाम के मार्गदर्शन में लेमनग्रास खेती को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया गया।
230 एकड़ में फैली खेती, 4 क्लस्टर सक्रिय
खरड़ी, पंडरी, अमारू और हरड़ी क्लस्टरों में 123 किसान लगभग 230 एकड़ भूमि पर लेमनग्रास की खेती कर रहे हैं। क्लस्टर मॉडल के तहत किसानों को उद्योगों से जोड़ा गया, जहां बुवाई से पहले ही तेल खरीद के अनुबंध कराए गए। उद्योगों ने बोरवेल, जुताई, पौधारोपण और फेंसिंग के लिए अग्रिम सहायता दी।
35 डिसमिल ज़मीन से सालाना 12 हजार की आय
बहरी–जोरकी गांव के किसान अगहन सिंह के पास केवल 35 डिसमिल भूमि थी। लेमनग्रास लगाने के चार माह में पहली कटाई से 4 लीटर तेल निकला, जिससे 4,000 रुपये की आय हुई। दूसरी कटाई से 8,000 रुपये मिले। एक ही रोपण से यह आय अगले पांच वर्षों तक मिलने वाली है।
पलायन रुका, आत्मनिर्भर बने किसान
शून्य बजट, त्वरित आय और सुनिश्चित बाजार के कारण किसान अब गांव में ही रोजगार पा रहे हैं। लेमनग्रास की खेती ने पलायन कम किया है और छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाया है।
