Thursday, February 12, 2026
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दंतेवाड़ा विश्व प्रसिद्ध फागुन मेले में निभाई जाएगी 600 वर्ष पुरानी आखेट परंपरा

by Dakshi Sahu Rao
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मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना के बाद बाजे-गाजे के साथ निकाली गई पालकी

CG Prime News@जगदलपुर. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के विश्व प्रसिद्ध फाल्गुन मेले (fagun mela dantewada) की 5 मार्च को शुरुआत हो गई। सबसे पहले कलश की स्थापना की गई। इसके बाद मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना के बाद बाजे-गाजे के साथ पालकी निकाली गई। इससे पहले बसंत पंचमी के दिन दंतेश्वरी मंदिर में त्रिशूल की स्थापना की गई। फागुन मेला में शामिल होने छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों से भी 1 हजार से ज्यादा देवी-देवता आएंगे। वहीं इस साल फाल्गुन मेला के लिए टेंपल कमेटी ने करीब 45 लाख रुपए का बजट रखा है।

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आखेट (शिकार) के लिए प्रसिद्ध

15 मार्च को देवी-देवताओं की विदाई तक फागुन मेला चलेगा। हर दिन मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा अर्चना होगी। साथ ही आखेट की विभिन्न रस्म अदा कर 600 साल पुरानी परंपरा निभाई जाएगी। दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी लोकेंद्र नाथ जिया की माने तो फागुन मेला आखेट (शिकार) के लिए प्रसिद्ध है। इसमें रस्में तिथि और समय के अनुसार 10 से 11 दिनों तक चलती हैं। अब शिकार का नाट्य रूपांतरण कर परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद शिकार शुरू किया गया था। अनुमति लेने वाले दिन से ही फागुन मड़ई की शुरुआत हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे स्थानीय देवी-देवताओं को भी इस मड़ई में शामिल किया जाने लगा।

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दंतेवाड़ा का विश्व प्रसिद्ध फागुन मेला शुरू, आखेट की निभाई जाएगी 600 साल पुरानी परंपरा

त्रिशूल स्थापना से मड़ई की शुरुआत

हर साल बसंत पंचमी के दिन माता दंतेश्वरी के मंदिर में गरुड़ स्तंभ के सामने त्रिशूल स्थापित किया जाता है। यह मेला शुरू करने की सबसे पहली रस्म होती है। फिर कुछ दिन बाद फागुन महीने में देवी की पूजा समेत दूसरी रस्में शुरू होती हैं। इस बीच मेले में शामिल होने के लिए निमंत्रण पत्र तैयार किया जाता है, जिसे देवी-देवताओं को भेजा जाता है।

9 दिन होती है देवी की विशेष पूजा

फागुन मेले में नवरात्रि की ही तरह माता दंतेश्वरी की 9 दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है। 10वें दिन यानी होली के दिन मेला भरता है। यहां ताड़ के पत्तों से होलिका दहन करने की परंपरा भी है। मेले के अंत में देवी-देवताओं को विदाई दी जाती है। श्रीफल और नेग भी दिया जाता है।

इन इलाकों से ये देवी-देवता हुए थे शामिल

पिछले साल बस्तर के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र बॉर्डर से भी देवी-देवता आए थे। पहली बार भद्रकाली और मेडाराम की देवी भी शामिल हुईं थीं। ओडिशा के 7 से 8 देवी-देवता मेले में शामिल हुए थे। इनमें कोसागुमड़ा गांव से हिंगलाजिन, तेलंगाना के मेडाराम से चिकलादई और बामनदई माता मेले में शामिल हुईं। बस्तर से काली कंकालीन देवी समेत अन्य देवी-देवता शामिल हुए थे।

ऐसे शुरू हुआ फागुन मेला

किवदंतियों के मुताबिक, करीब 600 साल पहले आखेट (शिकार) प्रचलित था। जंगली जानवर किसानों की फसलें खराब कर देते थे। ग्रामीण इस समस्या के निदान के लिए राजा-महाराजा के पास गए। तब तत्कालीन राजा ने जानवरों का शिकार करना शुरू किया था। राजा जब शिकार करते, तो दैवीय शक्ति की वजह से तीर लगने के बाद भी जानवर मरते नहीं थे। फिर राजा ने जानवरों के शिकार के लिए आराध्य देवी माता दंतेश्वरी की आराधना कर अनुमति ली थी।

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