CG Prime News@रायपुर. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निजी संपत्ति के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। मामला बिलासपुर जिले की मस्तूरी तहसील का है, जहां सरकारी स्कूल के शेड, रसोईघर और शौचालय के निर्माण में एक व्यक्ति की निजी जमीन का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने राज्य शासन को निर्देश दिया है कि प्रभावित जमीन के बदले याचिकाकर्ता को उसकी सहमति से समान क्षेत्रफल की उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जाए।
मामले में याचिकाकर्ता आशीष अवस्थी खसरा नंबर 66/14 की कुल 85 डिसमिल जमीन के दर्ज भूमिस्वामी हैं। यह भूमि 21 जनवरी 2021 को उनके नाम दर्ज हुई थी। उनकी जमीन से लगी सरकारी भूमि पर बालक प्राथमिक शाला संचालित है। स्कूल की सुविधाओं के विस्तार के दौरान करीब 0.15 एकड़ निजी जमीन पर निर्माण कराया गया।
तहसीलदार ने कब्जा लौटाने का दिया था आदेश
अपनी जमीन पर हुए निर्माण को लेकर आशीष अवस्थी ने तहसीलदार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था। उन्होंने निजी भूमि का कब्जा वापस दिलाने की मांग की। इस पर 29 दिसंबर 2022 को तहसीलदार ने कब्जा लौटाने का आदेश जारी किया।
हालांकि, स्कूल के विद्यार्थियों और कर्मचारियों को होने वाली संभावित परेशानी को देखते हुए याचिकाकर्ता ने जमीन खाली कराने के बजाय उसके बदले समान क्षेत्रफल की सरकारी जमीन देने का विकल्प मांगा।
अतिरिक्त कलेक्टर ने पिता की भूमिका का दिया हवाला
आशीष अवस्थी की मांग को अतिरिक्त कलेक्टर ने 27 नवंबर 2024 को खारिज कर दिया था। आदेश में उनके पिता दुर्गा सहाय अवस्थी के सरपंच रहने के दौरान स्कूल निर्माण पर आपत्ति नहीं किए जाने का उल्लेख किया गया। उनके पिता वर्ष 2005 से 2010 तक गांव के सरपंच थे। इस फैसले को आशीष ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने निजी संपत्ति के अधिकार पर की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ में हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता की कथित सहमति के आधार पर किसी दूसरे व्यक्ति की निजी संपत्ति का इस्तेमाल कानूनी नहीं माना जा सकता। जमीन देने के लिए वैधानिक सहमति, समझौते या हस्तांतरण का प्रमाण होना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने *विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य* मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी नागरिक को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
90 दिन में वैकल्पिक जमीन देने की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश
हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता की सहमति से 0.15 एकड़ के बराबर उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक आदेश पारित किए जाएं। इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निराकरण कर दिया।